शनिवार की सुबह कार स्टार्ट की और चल पड़े नैनीताल। बारिश की भीनी फुहारों के बीच दिल्ली से सफर शुरू हुआ। कॉर्बेट म्यूजियम के पास आते-आते बारिश कुछ शिकायती लहजों में आ गई। खैर, कुछ समय बाद उसका दिल पसीजा तो इतनी रियायत मिली कि सड़क किनारे ढाबे में रुक कर अदरक और इलायची वाली मीठी चाय का आनंद ले सकें। कुछ देर रुकने के बाद बढ़े तो सीधे काठगोदाम पहुंचे। सामने एक क्रेजी किचन का बोर्ड दिखा। जल्दी-जल्दी सूप और गर्मागर्म मोमोज को पेट के हवाले किया और पहाड़ों से मिलने चल पड़े।

भीमताल
काठगोदाम से 22 किलोमीटर की दूरी पर है भीमताल, बस आधे घंटे में यहां पहुंच गए हम। सड़क के किनारे साथ-साथ चलता यह ताल रुकने की गुहार लगाता है। हमेशा अगली बार रुकने का वादा करते और आगे बढ़ जाते थे मगर दिल ने कहा कि इस बार यहां रुक जाएं। नाम से कयास लगाया जा सकता है कि यह ताल महाभारत के समय से यहां रहा होगा। भीम के उग्र स्वभाव से सभी परिचित हैं। कहानी यह है कि जब वनवास के दौरान पांडव यहां से गुजर रहे थे तो उन्हें पानी की जरूरत महसूस हुई। भीम के तरकश से एक तीर निकला और भीमताल का जन्म हो गया। झील के किनारे भीमेश्वर मंदिर है। रंग-बिरंगी नौकाएं जल विहार का लालच देती हैं। पास की दुकान से रंग-बिरंगे छाते खरीदकर हम नौका भ्रमण पर निकल पड़ते हैं।

नौकुचिया ताल
नौ कोनों वाले इस ताल के बारे में सुना बहुत था। भीमताल से दूरी सिर्फ चार किलोमीटर ही थी पर गाडिय़ों की लंबी कतार थी। जल्द ही रास्ता साफ हुआ तो सड़क के दोनों तरफ फलों से लदे पेड़ लालच बढ़ाने लगे। एक जगह नाशपाती तोड़ते लोगों को देख हम रुक गए और जी भर नाशपाती खाई। लाल-हरे सेब भी स्वादिष्ट थे। जल्द ही ब्रह्मा जी रचित इस सुरम्य ताल के करीब पहुंच गए। रास्ते में वैष्णो माता मंदिर है, जहां हनुमान जी की ऊंची मूर्ति है। आंखें जितनी दूर तक जा रही थीं- शांत, स्थिर झील दिखाई दे रही थी, जिसे बादल ढकने को तैयार थे। यहां एक कमल ताल भी है, बड़े-बड़े फूलों से लदा। तभी कैफे बाई द लेक दिखा। हरी-भरी लताओं से ढका यह कैफे कॉफी की तलब बढ़ा रहा था। अंदर का माहौल सुरुचिपूर्ण है। आप चाहें तो देर तक कॉफी पिएं, किताबें पढ़ें, साथ में सैंडविच और फ्राई भी ले सकते हैं।

नल दमयंती ताल
भीमताल से सिर्फ 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह जगह हरियाली से भरपूर है। ऐसा मानना है कि नल इस ताल में डूब गए थे। सभी तालों के साथ कोई न कोई रोचक कहानी जुड़ी है। यहीं पास में हैं, पूर्णा ताल, सीता ताल, राम ताल, लक्ष्मण ताल, सूखा ताल। सभी तालों से गुजरते हुए ओक और पाइन के पेड़ों से मुलाकात हुई। बारिश में धुले-पुछे और शबाब में डूबे इन तालों ने मन मोह लिया।

खुरपा ताल
नैनीताल के रास्ते में दूर से ही खुरपा ताल दिखाई दिया, जिसके आसपास रंग-बिरंगे घर दिख रहे थे। पर्यटकों में दूर से ही सेल्फी लेने की होड़ देखने को मिलती है। खुशनुमा मौसम में भुट्टे, चाय, नूडल्स की खुशबू घुल-मिल गई है यहां। पैराग्लाइडिंग के रोमांच का आनंद उठाते कई लोग दिखे। रंगों-उमंगों का मेला उमड़ा पड़ा था।

नैनीताल
सबसे मशहूर है नैनीताल, रंग-बिरंगी नौकाओं से अटा पड़ा। पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती के नैन यहां गिरे थे, इसलिए इस जगह को नैनीताल के नाम से जानते हैं। झील के किनारे नैना देवी मंदिर है, कहा जाता है कि इसमें नहाने से उतना ही पुण्य मिलता है, जितना मानसरोवर झील में नहाने से। बोटिंग न की यहां तो क्या किया…। मछलियां, पेड़, बादलों की धमाचौकड़ी, पानी की बदलती रंगत…प्रकृति के सभी रंग लुभावने हैं। इस बार जो लौटे… मन अब तक वहीं किसी पेड़ की शाख पर अटका हुआ सा है…।

सात तालसात ताल यानी सात तालों का समूह। पहले ऐसा लगा कि यह किसी एक ताल का नाम है पर ऐसा नहीं है। ये दरअसल सात ताल हैं। पन्ना ताल या गरुड़ ताल के नाम से जाने गए इस ताल के समीप खामोशी और शांति का वास है।

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