old-delhi-sweet
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पुरानी दिल्ली खाने-पीने का लजीज खजाना समेटे है। संकरी-संकरी गलियों में भी कमाल की टेस्टी मिठाई-नमकीन बनाते-खिलाते हलवाई दशकों से जुटे हैं। सूजी हलवा, शीरमाल, गुलाब जामुन, मटर के समोसे/कचौड़ी, मथुरा के पेड़े, मलाई लड्डू वगैरह क्या-क्या नहीं है, तो सोचना क्या? पुरानी दिल्ली की गलियों के चंद उम्दा हलवाइयों से मुंह मीठा करवा रहे हैं अमिताभ:

अमीर स्वीट हाउस, हवेली आजम खान
मटिया महल और उससे जुड़ी गलियों में भी एक से एक हलवाई हैं। ऐसी ही एक मशहूर हलवाई की दुकान है ‘अमीर स्वीट हाउस।’ बाज़ार चितली कब्र से हवेली आजम खान गली में दाखिल होते ही दाईं तरफ चौड़े मत्थे की हलवाई शॉप है। फ्रंट में ही बड़ी-सी परात में सूजी हलवा गर्म होता रहता है। साथ में नागौरी हलवा, पूरी-छोले-आलू। पूरियों के साथ छोले और आलू की मिक्स सब्जी क्या लाजवाब है। संडे के संडे हलवे के साथ शीरमाल भी चाव से खाए जाते हैं। शीरमाल ब्रेड को फ्राई कर, चश्नी में डुबो कर बनाते हैं। संडे स्पेशल में उड़द दाल स्टफिंग की कचौड़ी और आलू की सब्जी। दोपहर बाद ब्रेड पकौड़े, मिक्स पकौड़े, समोसे वगैरह का सिलसिला शुरू हो जाता है। गुलाब जामुन, गाजर हलवा और मूंग दाल हलवा के अलावा होली तक सर्दियों की सौगात हबशी हलवा और गौंद का हलवा भी परोसा जाता है।

गर्मियों में रसमलाई और रसगुल्ले की धूम मच जाती है। मिठाई-नमकीन से वाहवाही बटोरने का सिलसिला 1965 से अमीर हसन के हाथों शुरू हुआ। फिर उनके बेटे हाजी जफरूद्दीन ने कमान संभाली। अब उनका हाथ बंटाते हैं दोनों पोते हाजी जुहैब हसन और हाजी रूजैब हसन। खास बात है कि सफेद गाजर के हलवे जैसी जाड़े की बहुत ही कम मिलने वाली मिठाइयां बनाते-परोसते हैं। खाने जाने से पहले खयाल रहे कि सर्दियों और गर्मियों का समय अलग है। सर्दियों में सुबह 6:00 से रात 12:00 बजे तक, तो गर्मियों में तड़के 4:30 से रात 11:00 बजे तक खाने वालों की रौनकें गुलजार रहती हैं।

राधे लाल हलवाई, मस्जिद खजूर
पुरानी दिल्ली की गलियों और गलियों के अंदर गलियों में फैले छोटे-छोटे लुके-छिपे हलवाई बड़ी उम्दा मिठाइयां खिलाकर दशकों से तारीफ बटोर रहे हैं। ऐसी ही एक बगैर बोर्ड-बैनर की छोटी-सी हलवाई की दुकान किनारी बाजार से धर्मपुरा को जाती गली मस्जिद खजूर में है। मशहूर है ‘राधे लाल हलवाई’ के तौर पर। दिवाली के आसपास बालूशाही, श्राद्ध के दिनों में इमरती, सावन में घेवर, होली के दौरान खोए की गुजिया वगैरह सारा साल बदल-बदल कर ताज़ी मिठाइयां बनाते-बेचते हैं। गुलाब जामुन, बर्फी और हरे मटर के समोसे तो सारा साल हिट हैं। गुलाब जामुन की 2 वरायटी हैं- एक सादे ओर दूसरा भरवां। हरे मटर के समोसों का तो बड़ा क्रेज़ है।

हर संडे की सुबह स्पेशल होती है, स्पेशल नाश्ते के साथ। आलू की गर्मागर्म सब्जी संग कढ़ाही से निकलती गर्म बेड़मी मैथी की चटनी लगा-लगा कर खाने का निराला लुत्फ है। पुरानी दिल्ली का फेवरेट नाश्ता आलू की सब्जी, हलवा और नागौरी भी हाजिर है। लोगबाग वहीं खड़े-खड़े खाते हैं। पैकिंग की सुविधा भी है। स्वाद की मिठास घोलते सिलसिले की शुरुआत 1924 से बंसीधर के हाथों हुई। फिर उनके बेटे सोहन पाल के बाद आज बुजुर्ग हो चुके पोते राधेलाल शर्मा और दोनों पड़पोते अजय और दीपक शर्मा जुटे रहते हैं। बिना छुट्टी कभी भी पहुंच जाएं- सुबह 8 से रात 9 बजे तक।

जय तारा, धर्मपुरा
किनारी बाज़ार से आएं या दरीबा कलां से, धर्मपुरा में ‘गोयल साहब की हवेली’ के नजदीक छोटी-सी पुरानी और आम मिठाई-नमकीन परोसती हलवाई शॉप ‘जय तारा’ का पुराना नाम ‘बद्री प्रसाद तारा चंद जैन’ है। दादी-नानी के जमाने की ठेठ रेसिपी से बनी मिठाई और नमकीन के 1944 से चर्चे हैं। शुरू में दूध की डेयरी थी। कुल्हड़ में गर्म कढ़ाही दूध और सोनीपत का पेड़ा बर्फी खास था। आज भी सात्विक मिठाई और स्नेक्स के लिए जानी जाती है। काउंटर पर ही पर्चे रखे हैं, जिन पर खासियतों का जिक्र है- मसलन, चांदी के वर्क का इस्तेमाल नहीं करते। नल के मुंह पर छननी लगी है, ताकि छने पानी का ही इस्तेमाल करें।

आलू समेत जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियों का प्रयोग भी नहीं करते। ऐसे सात्विक सुस्वाद के सफर की शुरुआत बद्री प्रसाद ने अपने बेटे ताराचंद जैन और बहू जयमाला जैन के साथ मिल कर की। आज उनके पोते सतीश जैन भारती ने आगरा के हलवाई सहयोगी विजय बहादुर के जरिए कई आइटम जोड़ी और नाम कर दिया ‘जय तारा।’ सारा साल सुबह 9:00 से रात 8:00 बजे तक मीठे-नमकीन स्वाद की रौनकें गुलजार रहती हैं। हालांकि साल के अलग-अलग मौसम/महीनों में मीठा और नमकीन बदलता रहता है। हर सुबह खस्ता कचौड़ी संग काबुली छोले की सब्जी क्या जोरदार है। कचौड़ी उड़द दाल और हरी मटर की है। फिर दोपहर से मटर के ही समोसे तल-तल कर लाइन लगा कर बिकने लगते हैं। कचौड़ी और समोसों के संग मेथी की चटनी सर्व की जाती है। बेसन के सेव, कुरमुरे, मठरी, नमक पारे वगैरह भी खूब पसंद किए जाते हैं। मिठाइयों में गुलाब जामुन और केसर पाक साल भर बनते-बिकते हैं। गुजिया, घेवर, बालूशाही, बेसन-आटे-मावे के शाही लड्डू, मूंग दाल बर्फी वगैरह भी साल के कुछेक महीनों में सज जाते हैं।

मनोहर लाल दूध वाले, कूचा पाती राम
मथुरा के पेड़े दिल्ली में खाने का मन करे, तो चलिए सीताराम बाज़ार की गली कूचा पाती राम में। सीता राम बाज़ार से गली में दाखिल हों, तो ज़रा आगे ‘कूरेमल मोहन लाल कुल्फी वाले’ के बाद दाईं तरफ ही गली बाल मुकुंद के बगल की छोटी पुरानी दुकान ‘मनोहर लाल दूध वाले’ की है। सामने छोटे-से शोकेस में रबड़ी, खुरचन, मलाई लड्डू, कलाकंद वगैरह गिनी-चुनी मिठाइयां सजी रहती हैं। सबसे खास हैं मथुरा के पेड़े। रोजाना दोपहर बाद से भर-भर परात ताजे बनते हैं और शाम होते-होते चट हो जाते हैं। करीब 90 लीटर दूध को 3-4 घंटे कढ़ाही में काढ़-काढ़ कर 10 किलो तक गाढ़ा करते हैं। फिर परात में भरकर, सामान्य तापमान में लाकर पेड़े की शक्ल में ढालते हैं।

शो और स्वाद बढ़ाने के लिए ऊपर करारा (चीनी बूरा) लिपटा-छिड़क कर ट्रे में सलीके से सजाते हैं। पेड़े वाकई मथुरा जैसे स्वादिष्ट हैं। खाने में इतने मुलायम कि मुंह में रखते ही घुल जाते हैं। स्वाद का राज़ है कि 1970 के आसपास मथुरा से आकर पुश्तैनी हलवाई परिवार के मनोहर लाल गर्ग ने यहां पेड़ों से धूम मचा दी। फिर 1980 से उनका बेटा संजय गर्ग पेड़े समेत तमाम मिठाइयां बनाने का हुनर सीख कर तारीफ बटोर रहा हैं। खैर, दिल्ली में ठेठ मथुरा के पेड़ों से मुंह मीठा करने कभी भी पहुंच जाएं-बिना नागा रोज सुबह 7:00 से रात 10:00 बजे तक।

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