भगवान शिव

भगवान शिव को समर्पित सबसे बड़ा त्योहार महाशिवरात्रि मार्च महीने की 4 तारीख को देशभर में मनाया जाएगा। इसके साथ ही दुनिया में जहां भी शिवभक्त रहते हैं, वहां शिव के जयकारों की गूंज सुनाई देगी। हम यहां भगवान शिव को समर्पित 5 प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में बता रहे हैं। अगर शिवरात्रि पर किसी एक मंदिर में भी आप दर्शन कर पाए तो खुद को धन्य समझिए…

टपकेश्वर महादेव मंदिर, देहरादून
टपकेश्वर महादेव का मंदिर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर पौराणिक काल का बताया जाता है। साथ ही महाभारत काल के महान योद्धा अश्वत्थामा से भी इस मंदिर का संबंध बताया जाता है। दंत कथाओं की मानें तो यह वह स्थान है, जहां देवताओं ने भगवान शिव की तपस्या की और उनके देवेश्वर रूप के दर्शन किए। साथ ही महाभारत काल में अश्वत्थामा ने यहां भगवान शिव की तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने गुफा की छत से दूध की धारा बहा दी। यह धारा गुफा के अंदर स्थित शिवलिंग पर टपकने लगी। कलयुग की शुरुआत में दूध की यह धारा जल में परिवर्तित हो गई, जो आज भी टपकती है।

नीलकंठ महादेव मंदिर, ऋषिकेष
उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित है नीलकंठ महादेव का मंदिर। यह मंदिर वैदिक काल से शिव की धरती कहे जानेवाले ऋषिकेष की सीमाओं में आता है। इस मंदिर का पौराणिक महत्व है। यही वह स्थान है, जहां भगवान शिव ने समुद्र मंथन में निकला विष धारण करने के बाद विश्राम किया। हलाहल विष पेट में न जाए, इसके लिए शिवजी ने उसे गले में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया। इसी कारण यहां स्थित शिवलिंग को नीलकंठ महादेव के नाम से जाना जाता है।

भूतनाथ मंदिर
भगवान शिव को समर्पित बाबा भूतनाथ का मंदिर हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर में स्थित है। इस मंदिर की स्थापना की कहानी बहुत ही रोचक है। कहते हैं कि 15वीं शताब्दी में राजा अजबनेर को सूचना मिली कि शहर में एक स्थान पर जाकर जब गाय खड़ी होती है तो वहां उसके दूध की धारा स्वयं ही बहने लगती है। इस पर जब राजा ने वहां छान-बीन और खुदाई कराई तो पता चला कि यहां जमीन के नीचे एक शिवलिंग स्थित है और इस शिवलिंग की महिमा से ही गाय यहां दूग्ध की धारा बहाती थी। तब राजा अजबनेर ने शिखारा शैली में इस मंदिर का निर्माण कराया।

बैजनाथ मंदिर, हिमाचल प्रदेश
बैजनाथ महादेव का मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है, जो पालमपुर क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ बताया जाता है। हालांकि इस मंदिर और यहां स्थित शिवलिंग की स्थापना त्रेतायुग की है। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण ने शिवजी से प्रार्थना की कि वह उन्हें शिवलिंग के रूप में अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। इस पर शिवजी ने कहा कि ठीक है लेकिन तुम पूरे रास्ते में इस शिवलिंग को कहीं भी धरती पर नहीं रखोगे। रावण जब कैलाश से शिवलिंग लेकर चला तो रास्ते में उसे लघुशंका लगी और वह शिवलिंग को एक साधु के हाथों में थमाकर चला गया। वह साधु कोई और नहीं स्वयं देवऋषि नारद थे। नारदजी ने उस शिवलिंग को धरती पर रख दिया और जब रावण ने उसे वहां से उठाने का प्रयास किया तो वह इन्हें हिला भी नहीं पाया। तभी से यह शिवलिंग यहां स्थित है।

तिलभांडेश्वर मंदिर, वाराणसी
वाराणसी और हरिद्वार, हमारे देश की ये दो नगरियां शिव की नगरी कहलाती हैं। हालांकि शिव शंभू तो धरती के हर कण में विद्यमान हैं लेकिन शिव की महिमा के दर्शन करने भक्त बड़ी संख्या में हरिद्वार और वाराणसी जाते हैं। वाराणसी के तिलभांडेश्वर मंदिर की महिमा बहुत निराली है। यह स्वयंभू मंदिर है। इस मंदिर को मुगल शासन के दौरान कई बार खंडित करने का प्रयास किया गया लेकिन हर बार मुगलों को हारकर ही जाना पड़ा। धार्मिक आस्था है कि यह मंदिर हर साल एक तिल के आकार जितना बढ़ जाता है। इसलिए इसे तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

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